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शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2011

एक दीप अँधेरे में ...

एक दीप अँधेरे में ...
बरसों से मंदिर के कपाट में 
एक दीप अँधेरे में जल रहा है 
रोशनी की तलाश में भटककर खुद से लड़ रहा है 
कितने दिन बीत गए ...
अपने रूप को , आईने में नही देख पाया 
थोड़ा सा तेल 
वहीं पुरानी बाती 
उसी कपाट पर 
बंद , पडा अपनी दशा से परेशान
फिर भी धीमें -धीमें  जल रहा है 
उस उजले दिन की इंतजार में 
बुझता और जलता 
नया सबेरा ढूंढ़ रहा है 
बरसों से मंदिर की कपाट में 
एक दीप अँधेरे में जल रहा है 

लक्ष्मी नारायण लहरे "साहिल "

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर बिम्ब प्रयोग्………सुन्दर भावाव्यक्ति।

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  2. बुझता और जलता
    नया सबेरा ढूंढ़ रहा है
    बरसों से मंदिर की कपाट में
    एक दीप अँधेरे में जल रहा है

    ...........बहुत ही खूबसूरत भाव और सन्देश भी

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    1. संजय भाई हार्दिक आभार ... कोसीर ... ग्रामीण मित्र ! में आपका स्वागत है ,बरसो से आप लोंगो का इंतजार था मेरे भी ब्लॉग का अनुशरण कर उत्साहित करें ...

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